आज मैं 17 की हूँ,
हॉस्टल के एक छोटे से कमरे में,
जहाँ खिड़की से सपने तो दिखते हैं,
पर रास्ता अभी भी धुंधला है।
याद है मुझे अपना पहला दिन —
भारी बैग,
भीगी पलकों के साथ
जब इस कमरे में कदम रखा था।
दीवारें अनजान थीं,
सब कुछ नया सा था,
और दिल…
घर की आवाज़ें ढूँढ रहा था।
क्लासरूम भी तब कितने अलग लगे थे,
हर चेहरा नया,
हर आवाज़ अनसुनी।
पीछे वाली बेंच पर बैठकर
मैंने खुद को थोड़ा छुपाया था,
जैसे डर था कि कोई
मेरी घबराहट पढ़ न ले।
दिन बीतते गए —
कभी हँसी में,
कभी चुप्पी में,
कभी ऐसे भी
जब लगा सब कुछ पीछे छूट गया है।
पर हर रात जब लाइट बंद होती है,
और कमरे की खामोशी
मेरी सोच से बातें करती है,
तब दिल बस एक ही बात कहता है —
रुकना मत।
शायद आज मैं वह नहीं हूँ
जो बनना चाहती हूँ,
पर यही कमरा,
यही क्लासरूम,
यही अकेली रातें…..
मुझे वहाँ तक ले जाएँगी।
एक दिन जब मैं 18 की होकर ,
जाऊँगी विद्यालय से दूर …
और पीछे मुड़कर देखूँगी —
इस खिड़की के उस पार !
तो यही चार दीवारें
मेरी सबसे बड़ी ताक़त बन चुकी होंगी।
यही डर,
यही आँसू,
यही छोटी-छोटी जीतें
मेरी पहचान बनेंगी।
आज संघर्ष है,
तो कल मंजिल होगी।
और इस “यहाँ” से “वहाँ” तक का सफ़र —
सिर्फ मेरा है।
नित्या जोशी
कक्षा- XI
कक्षा- XI



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