परदे के पीछे से मंच तक: एक यादगार थिएटर यात्रा

“और पर्दा खुला, लाइट्स चमकीं साथ ही माइक ऑन हो गए – आख़िरकार, यह शो का समय था!” 19 अप्रैल से 23 अप्रैल तक हर दिन, हम बिरला बालिका विद्यापीठ की छात्राएँ अपने दृष्टिकोण को थिएटर के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए दृढ़ संकल्पित थीं।

श्री अभिषेक पटनायक और श्री आहान निर्बान के मार्गदर्शन में विद्यालय की हम 80 छात्राओं ने  “आउट ऑफ द बॉक्स प्रोडक्शंस” थिएटर वर्कशॉप में भाग लिया। पहले दिन हमने वॉइस एक्सरसाइज़ की, जिसमें हमने अपनी आवाज़ को स्तर 1 से स्तर 10 तक बढ़ाया। स्तर 9 और 10 काफी कठिन थे।

इसके बाद हुए हमारे ऑडिशन । मैंने एक समीक्षक (reviewer) की भूमिका के लिए ऑडिशन दिया था, लेकिन मुझे मैनेजर की भूमिका मिल गई—जो सबसे कठिन और साथ ही मुख्य भूमिका भी थी। दूसरे दिन हमारी भूमिकाएँ निश्चित हो गईं।

मैनेजर बनना आसान नहीं था। उच्चारण कठिन नहीं था, लेकिन सबसे मुश्किल था अपनी ऊर्जा को अंतिम पंक्ति तक पहुँचाना ताकि हर कोई कहे—”हाँ, यह मंच पर कोई प्रभावशाली व्यक्ति है!” मैंने प्रयास किया, लेकिन हर दिन बहुत थक जाती थी।

तीसरे और चौथे दिन तक यह स्पष्ट हो गया कि अभिनय केवल संवाद बोलना नहीं, बल्कि उसे जीना है। मुझे अपनी ऊर्जा बढ़ाने के लिए कहा गया। मुझे इसकी उम्मीद थी, लेकिन यह नहीं सोचा था कि मुझे अपनी भूमिका को वास्तविक जीवन में भी निभाना पड़ेगा। मैंने पूरे नाटक के प्रतिभागियों को मैनेज करना शुरू कर दिया। मैं सिर्फ एक कलाकार नहीं रही, बल्कि एक ‘निर्देशक’ भी बन गई।

चौथे दिन भी मुझे बार-बार अपनी ऊर्जा बढ़ाने के लिए कहा गया। मैं थकी हुई थी, लेकिन सीखने की ललक थी। अभिनय करने की इच्छा ने मुझे ऊर्जा दी। जो मंच पहले मुझे अपना दुश्मन लगता था, जहाँ मैं हमेशा असहज महसूस करती थी, वही अब मेरा मित्र बन गया—एक ऐसी जगह जहाँ मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकती थी।

अंतिम दिन हमारी दो रिहर्सल हुईं। दूसरी रिहर्सल ही एकमात्र थी जो पहले दिन से पाँचवें दिन तक की सभी रिहर्सल में सही रही। उसके बाद अभिषेक सर ने मुझे फीडबैक के लिए बुलाया। आज भी मुझे उनकी बातें याद हैं—
“शिविका! अगर तुम्हारी शुरुआत में ऊर्जा नहीं है, अगर वह ठंडी है, तो पूरा नाटक ठंडा  होजाएगा। इसलिए पूरे उत्साह के साथ प्रदर्शन करो।”

मुझे लगता है कि यह प्रेरणा मेरे अंतिम प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी।

अंतिम प्रस्तुति से पहले, मंच के पीछे मैं डरी हुई थी, घबराई हुई थी। लेकिन जैसे ही संगीत बजा और मैंने परदा उठाया, मेरा डर आत्मविश्वास में बदल गया और दर्शकों की हँसी के साथ और भी बढ़ गया। धीरे-धीरे वह मंच, जो कभी भय का कारण था, आत्मविश्वास और अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया।

प्रस्तुति समाप्त हो गई, लेकिन वह अभिनय मेरे अंदर का एक बड़ा हिस्सा बन गया। मुझे पूर्णता का अनुभव हुआ और एहसास हुआ कि यह केवल एक कार्यशाला नहीं थी, बल्कि एक अवसर था।

आज भी जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो याद आता है कि सभी हाउस एक-दूसरे की मदद कर रहे थे। हमारे निदेशक सर ने कहा था—“यह इंटर-हाउस प्रतियोगिता नहीं है, इसे प्रतियोगिता मत बनाओ।”

मैं इस कार्यशाला और उन सभी लोगों की आभारी हूँ जिन्होंने इस सपने को वास्तविकता बनाया। अब मैं हमेशा तैयार हूँ- परदे उठाने और अभिनय करने के लिए।

शिविका त्यागी
कक्षा: X


Comments

One response to “परदे के पीछे से मंच तक: एक यादगार थिएटर यात्रा”

  1. Achala Verma

    One of the excellent performances I have seen in BBV. Shivika was outstanding!

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