मार्च की धूप जरा, अलग-सी थी,
हवा में जैसे घबराहट घुली थी।
मैदान में जो शोर मचाते थे हम,
अब लाइब्रेरी में भीड़ लगी थी।
किताबें जैसे अचानक प्रिय हो गई थीं,
कॉपियों से दोस्ती गहरी हो गई थी।
कल तक जो कहते थे – “अभी तो समय है”,
आज उनकी भी बोलती बंद हो गई थी।
गणित के सूत्र आँख दिखाने लगे,
इतिहास की तारीखें नानी याद दिला गई!
दिमाग बेचारा धीरे बोला –
“इतनी पढ़ाई! ये कैसी घड़ी आ गई?”
दोस्तों का भी था गजब ही हाल!
किसी का पेन छूटा, तो किसी का सवाल।
कोई बोले– “बस पास करा दे भगवान”!
तो कोई बोले– “इस बार तो करूँगी कमाल!”
सर ने हंसकर समझाया-
“डरने से तो बेटा, कुछ नहीं होगा,
मेहनत में जो दोस्ती कर ले
उसका ही कल रोशन होगा।”
मैडम ने भी हिम्मत दिलाई,
बोली – “बस मन लगाकर पढ़ना।”
नंबर अपने आप आ जाएँगे,
पर पहले खुद पर भरोसा रखना।
उनकी बातें दिल को छू गई,
घबराहट का साया जैसे हट गया।
थोड़ी मेहनत, थोड़ी हँसी में,
इम्तिहान का मौसम भी कट गया।
सीखा हमने उस सफर से,
घबराने से कुछ नहीं है होता।
मेहनत का दीपक जो जलाए,
सफलता का मुकाम उसे ही मिलता।
गुरु का जो साथ मिला हमें
हिम्मत मन में ढाल बन गई।
कक्षा नौवीं की यह वार्षिक परीक्षा,
एक प्यारी-सी याद बन गई।
आकांक्षा बनिक
कक्षा- नवीं




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